DHOLA AUR MARU
रेगिस्तान
की रेतों में, इक प्रेम
कहानी बसी थी,
ढोला
नाम का राजकुमार, मारू
रानी की हँसी थी।
बालपन
में बंधा था बंधन,
दो दिलों का मेल हुआ,
पर समय की चाल
में, प्रेम का संदेश ही
धुंधला हुआ।
मारू
बैठी पाली में, ढोला
दूर नरवर में था,
संदेशों
की राहें बंद थीं, मन
में प्रेम मगर गहरा था।
हर दिन वो ऊँटों
से पूछे, “क्या ढोला आएगा?”
हर साँझ वो तारे
गिनती, “क्या संदेशा लाएगा?”
ढोला
को थी दूसरी रानी,
मालवणी नाम सुहानी,
वो प्रेम में डूबा था,
भूला अपनी बचपन की
कहानी।
मारू
ने भेजे संदेश कई,
साधु बन कर आए
कई,
पर मालवणी ने रोके सब,
प्रेम की राहें हुईं
कठिनाई।
एक दिन साधु ने
चाल चली, गीतों में
प्रेम जगाया,
ढोला
का दिल फिर जागा,
उसने मारू को अपनाया।
ऊँटों
पर सवार हुए दोनों,
रेगिस्तान की राह चली,
मालवणी
ने भेजे सैनिक, प्रेम
की राह फिर मुश्किल
हुई।
मारू
ने वीणा उठाई, स्वर
में जादू बिखेरा,
सैनिकों
के मन को छू
लिया, प्रेम ने फिर से
घेरा।
ढोला-मारू संग चले,
रेतों में प्रेम की
छाया,
राजस्थान
की धरती ने, फिर
अमर गाथा गाया।
आज भी जब ऊँट
चले, रेतों में गीत सुनाई
दे,
ढोला-मारू की प्रेम
कथा, हर दिल को
छू जाए रे।
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