1
ख़्वाहिश
मन की अनकही आवाज़
है ख़्वाहिश।
आसमान
पर पाँव रख
उड़ जाने की तमन्ना
है ख़्वाहिश।
सपनों
की सीमाएँ लाँघ,
दुनिया से परे
अपना एक जहाँ बसाने
की चाह है ख़्वाहिश।
समुद्र
के ज्वार-सी बेचैन,
क्षितिज-सी अनंत है
ख़्वाहिश।
चाँद
की शीतल अग्नि में
जलकर,
अँधेरे को चीरती
एक रोशनी की लौ है
ख़्वाहिश।
ख़्वाहिश
तो हर मन में
होती है।
कुछ
आकार ले लेती हैं,
और कुछ
मन के दरवाज़े तक
आकर
चुपचाप लौट जाती हैं।
ख़्वाहिशें
तो हज़ारों हैं,
पर उन्हें जीने के लिए
एक ज़िंदगी काफ़ी नहीं।
2
ख़्वाहिश
साँसों के साथ ही
हर एक मन में कई ख़्वाहिशें बस जाती हैं।
पालने में झूलते बच्चे की चाह—
कैसे कर दुनिया अपनी मुट्ठी में बंद कर लूँ।
बस्ते के बोझ तले कैद ख़्वाहिश की—
कैसे कर पेड़ों संग झूम जाऊँ।
बहते झरने की ख़्वाहिश—
कैसे कर समुंदर में मिल जाऊँ।
पतंग की ख़्वाहिश—
कैसे कर आसमान से टकरा जाऊँ।
फूलों की ख़्वाहिश—
कैसे कर सुगंध बन फैल जाऊँ।
हर ख़्वाहिश एक सपना है,
जो कहता है—
बस यहीं तक नहीं,
चलो, आगे बढ़ो।
अभी तो मंज़िलें और हैं,
रास्ते भी और।
थककर बैठ जाओ अगर,
दबी ख़्वाहिशें मन को कचोट लेंगी।
आँसू बन आँखों से बहेंगे,
और भीग जाएगा दामन।
ख़्वाहिशें कभी ख़त्म नहीं होतीं।
इसीलिए तो मन ज़िंदा रहता है।
मार दो अगर हर ख़्वाहिश को,
साँस लेकर भी
साँस नहीं आती।