एक धुआं हर तरफ है
एक सन्नाटा हर तरफ है
शोर ओ गुल में भी
खोया हुआ सा हर इंसान है
वक्त एक ऐसा था कभी
की कोई हो न हो
भरा पूरा सा हर लम्हा था
तन्हाईयों में साथी थे
एक सन्नाटा हर तरफ है
शोर ओ गुल में भी
खोया हुआ सा हर इंसान है
वक्त एक ऐसा था कभी
की कोई हो न हो
भरा पूरा सा हर लम्हा था
तन्हाईयों में साथी थे
ख़ामोशी में भी हंसी थी
आज उन पलों की फ़क्त याद ही बाकी है
भीड़ के बीच होने पर भी
अकेला ,तनहा हर एक मंजर है।